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दांत साफ

दांत साफ  डॉ. लूनेश कुमार वर्मा  रायपुर छत्तीसगढ़  दिन निकला। हाथी राजा जागा। झटपट तैयार हो नहाने के लिए नदी जाने लगा। गोलू बंदर बोला रुको, मैं भी चलता हूं। हाथी राजा बोला- ठीक है, एक से भले दो। अपनी लंबी सूंड हिलाता, विशालकाय शरीर चलाता हाथी राजा निकला। उसकी पीठ पर गोलू बंदर बैठ गया। दोनों मजे से जा रहे थे। रास्ते में आम का पेड़ दिखा। आम खूब फला था। बंदर ललचाया। हाथी राजा से बोला रुको मैं अभी आम खाकर आता हूं। हाथी ने मना किया। अरे तुम अभी नहाए नहीं हो। दांत भी साफ नहीं किए हो। गोलू बंदर जिद्दी था। नहीं माना। कूदकर आम के पेड़ पर चढ़ गया।  पेड़ पर आम रखवाली के लिए कोयल रानी बैठी थी। उसने कहा- तुमने बिना पूछे मेरे पेड़ के आम तोड़ लिए। इसका तुम्हें दंड मिलेगा। भालू कोतवाल को बुलाई। भालू कोतवाल उसे जंगल के राजा शेर के पास ले गई।  जंगल के राजा ने कहा दंड मिलेगा। कहा- तुमने बिना नहाए-धोए और बिना दांत साफ किए, बिना पूछे आम तोड़े हैं। इसलिए आज से तुमको घर से निकाला जाता है। तब से बंदर इस डाल से उस डाल भटक रहा है। नैतिक शिक्षा- सुबह सुबह दांतों की सफाई करना चाहिए, नहाना ...

बनावटी व्यवहार

बनावटी व्यवहार  समाज में ऐसे बहुत से लोग होते हैं, जो इसलिए नापसंद की जाते हैं, क्योंकि उनका व्यवहार बनावटी होता है। बनावटी व्यवहार का तात्पर्य सामने कुछ और व्यवहार करना और वास्तविक व्यवहार कुछ और होना होता है।  ऐसे लोग जो सामने होने पर अच्छा व्यवहार करते हैं और पीठ पीछे बुराई करने लग जाते हैं। ऐसे ही लोगों के लिए कहा जाता है- मुंह में राम बगल में छुरी। जिनका भी इस तरह का दोगलापन व्यवहार होता है, उन पर कभी कोई विश्वास नहीं करता है।  यदि हमें लोगों का विश्वास अर्जित करना है तो निश्चित रूप से सद्व्यवहार करना होगा। अपने कहे हुए पर अडिग रहना होगा। जो व्यक्ति अपने कहे हुए पर अधिक रहता है, वह सहज ही लोगों का विश्वास अर्जित कर लेता है।  लोग किसी की इज्जत इसलिए नहीं करते हैं कि वह बड़ा व्यक्ति है। इज्जत इसलिए किया जाता है क्योंकि वह व्यक्ति सच्चरित्र होता है। ऐसे ही चरित्रवान व्यक्ति की यदि समाज में खोज की जाए तो शिक्षक वर्ग इसमें प्रायश: खरा उतरता है।  शिक्षण केवल व्यवसाय मात्र नहीं है अपितु चरित्र निर्माण का महत्वपूर्ण उद्यम है। शिक्षक सदैव चरित्रवान रहकर अपने चरित्र ...

फुलवारी

फुलवारी  आओ चलो थोड़ा समय निकालें, दौड़ धूप व भागम भाग जीवन से।  चलें वहां जहां फूलों का बगीया हो रंग बिरंगे खिले हुए हों फूल ढेर सारे।  खो जाएं हम भी उस रंगीन दुनिया में  पत्तियों बीच नीले पीले लाल गुलाबी। खिलते खिलाते एक दूसरे से बतियाते  महकते निहारते संवारते हिलते डुलते। अरे! देखो-देखो तितली रानी आयी रसवन्ती फूलों को सार्थक करती सी। शनै: शनै: मधु मकरंद उड़-उड़ लेती। एक फूल से दूसरे तीसरे तक जाती। मानो जाकर कुछ कहती कानों में  रस पी रस घोलती हंसी बागों में। कुछ पल चलें छोड़ दुनियादारी को ऐसी किसी सुंदर सी फुलवारी में। डॉ. लूनेश कुमार वर्मा  रायपुर छत्तीसगढ़ 

आवरण

आवरण कुछ लोग होते हैं ऐसे  हरदम रहते हंसमुख। कोई भला कैसे जाने उसके दुःख और सुख। अंतस की पीड़ा पीकर खुश होने करते उपक्रम। होते महान कलाकार वे भीतर आग दिखता जल। गंभीर से गंभीर स्थिति में  रहते सदैव सहज-सरल। कोई भला कैसे जाने  पी रहा वह अंदर गरल। सच है बनावटी संसार में  कोई कहां होता अपना? स्वार्थ साध चलते राह आवरण से छुपता दुखड़ा। दुखड़ा सुन पसीजता  कहां किसी का हृदय? सहानुभूति जता जाते आप बीती स्वयं दर्शन। संसार जाने जो भाषा  बस वैसे ही रहना है। भीतर रोना बाह्य आनंद  अब तो यही दिखना है। डॉ. लूनेश कुमार वर्मा  रायपुर छत्तीसगढ़ 

देश भक्ति

देश भक्ति  चिंटू विद्यालय से बड़ी खुशी-खुशी आया। आकर उसने मां से बड़ी तत्परता से कहा- आज विद्यालय में हमे एक नई चीज पता चली।  मां ने चिंकू को सहलाते हुए कहा- क्या? चिंटू ने कहा- आज मास्टर जी विद्यालय में हमें बताया कि स्वतंत्रता दिवस आ रहा है। हम सबमें देश प्रेम की भावना होनी चाहिए। देश भक्ति के लिए बहुत कार्य या बलिदान होना आवश्यक नहीं है, अपितु हम छोटे-छोटे कार्यों से भी देश भक्ति प्रदर्शित कर सकते हैं। जैसे- किसी को दुःख न देना, दीन दु:खी पीड़ितों की सेवा करना, अपना काम ईमानदारी से करना, शासकीय संपत्ति की सुरक्षा करना आदि।   देखते-देखते स्वतंत्रता दिवस आ गया। स्वतंत्रता दिवस के लिए मास्टर जी ने सभी छात्रों को साफ-सुथरे कपड़े पहनकर सुबह शीघ्र ही बुलाया था। चिंटू भी शीघ्र ही विद्यालय जाने के लिए घर से निकला। रात भर से बारिश हो रही थी।  सभी छात्र समय से विद्यालय पहुंच गए थे। चिंटू नहीं पहुंचा था। विद्यालय से प्रभात फेरी निकाली गई। रास्ते में ही चिंटू सड़क किनारे कीचड़ से सना हुआ मिला।  मास्टर जी ने चिंटू से पूछा- तुम आज विद्यालय क्यों नहीं आए। चिंटू ने पहले...

नेताजी

नेताजी (हास्य आधारित) जीवन बनना हो सफल  कर एक काम जरूर  पढ़ना है तो पढ़ लो  वरना नेता बन लो। पुलिस का आचरण देवता समझ पूजना सदा आशीर्वाद लेना दुम हिलाते रहना। नेता जी की शरण लो भले हो पेटू कितना  सब पच जाता है  भ्रष्टाचार छन जाता है। चांद पर क्यों जाना  नेता जी के पास जाना  अपने ही आप मिलेगा  दर्शन का लाभ सदा। कभी हो कोई समस्या  नेताजी से कहना  नेताजी एकदम सीधे रसभरे जलेबी हों जैसे। नेताजी के कपड़े  चक सफेद सदा आचरण भी ऐसा ही  गलत कहां रहते हैं। जितनी चमचागिरी  झूठ हो सच बोलना  सदा मिलेगी प्रतिष्ठा  बस मिठास घोलना। ये सीख लो जल्दी  झूठ-मूठ का ठहाका  आंखों में पानी भरना  नेताजी रंग चमकाना। पेट पकड़ के हंसना घड़ियाली आंसू बहाना  यूं ही आंखें चलाना  नेताजी मौज ही मौज। कहीं समय से न जाना  आत्मसात भाव दिखाना  पान खाके थूक देना नेताजी नाम कमाना‌। डॉ. लूनेश कुमार वर्मा  रायपुर छत्तीसगढ़

श्री कृष्ण के रूप

श्री कृष्ण के रूप  कृष्ण का जन्म विपरीत परिस्थितियों में कंस की काल कोठरी में हुआ। जन्म होते ही उन्हें अपने वास्तविक माता-पिता से दूर होना पड़ा। नंदग्राम में नंद बाबा और यशोदा मैया के संरक्षण में इनका लालन-पालन हुआ। यहां भी संकटों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। कृष्ण बचपन से ही लीला करने वाले रहे हैं। पूतना से लेकर चाणूर तक सबका उन्होंने लीला करते हुए संहार किया।  कृष्ण के वास्तविक के पिता वसुदेव और माता देवकी हैं। वासुदेव के पुत्र होने के कारण कृष्ण को वासुदेव और माता देवकी के पुत्र होने के कारण उन्हें देवकीनंदन कहा जाता है। कृष्ण का लालन-पालन चूंकि नंद बाबा और यशोदा मैया ने किया था। इसलिए कृष्ण को नंदलाल और यशोदा नंदन के नाम से भी जाना जाता है। वासुदेव का रंग काला था। इसलिए इन्हें कृष्ण, श्याम कहा जाता है। तद्भव रूप मे कृष्ण को केशव, कन्हैया, किसन भी कहा जाता है।  कृष्ण को बचपन से ही मक्खन बहुत प्रिय था। वे अपने बाल सखाओं के साथ दूसरों के घरों से माखन चोरी कर खा लिया करते थे। इसलिए उन्हें माखन चोर के नाम से भी संबोधित किया जाता है। कृष्ण के नटखट स्वभाव के कारण इन्हें नटखट भी ...