श्री कृष्ण के रूप
श्री कृष्ण के रूप
कृष्ण का जन्म विपरीत परिस्थितियों में कंस की काल कोठरी में हुआ। जन्म होते ही उन्हें अपने वास्तविक माता-पिता से दूर होना पड़ा। नंदग्राम में नंद बाबा और यशोदा मैया के संरक्षण में इनका लालन-पालन हुआ। यहां भी संकटों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। कृष्ण बचपन से ही लीला करने वाले रहे हैं। पूतना से लेकर चाणूर तक सबका उन्होंने लीला करते हुए संहार किया।
कृष्ण के वास्तविक के पिता वसुदेव और माता देवकी हैं। वासुदेव के पुत्र होने के कारण कृष्ण को वासुदेव और माता देवकी के पुत्र होने के कारण उन्हें देवकीनंदन कहा जाता है। कृष्ण का लालन-पालन चूंकि नंद बाबा और यशोदा मैया ने किया था। इसलिए कृष्ण को नंदलाल और यशोदा नंदन के नाम से भी जाना जाता है। वासुदेव का रंग काला था। इसलिए इन्हें कृष्ण, श्याम कहा जाता है। तद्भव रूप मे कृष्ण को केशव, कन्हैया, किसन भी कहा जाता है।
कृष्ण को बचपन से ही मक्खन बहुत प्रिय था। वे अपने बाल सखाओं के साथ दूसरों के घरों से माखन चोरी कर खा लिया करते थे। इसलिए उन्हें माखन चोर के नाम से भी संबोधित किया जाता है। कृष्ण के नटखट स्वभाव के कारण इन्हें नटखट भी कहा जाता है। कृष्ण और सुदामा की मित्रता संपूर्ण जगत में अनोखी है। इसलिए कृष्ण को सुदामा सखा के नाम से भी जाना जाता है।
बाल्य काल में ही गोकुल के गोपालों के साथ खेलते, गौ चराते हुए गोपाल नाम को उन्होंने सार्थक किया। बाल्य काल में ही खेलते-खेलते एक दिन गेंद यमुना नदी में गिर गया। यमुना नदी में उस समय वासुकी नाग का आतंक छाया हुआ था। कृष्ण जब यमुना से गेंद निकालने के लिए गए, तब वासुकी नाग उन्हें आतंकित करने का प्रयास किया। तब वासुकी नाग के मद को चूर करते हुए उन्होंने उस नाग को नाथ लिया। तब से कृष्ण को वासुकी नाथ के नाम से भी जाना जाता है।
मधुर मुरली बजाते हुए वे मुरलीधर के नाम से प्रसिद्ध हुए। गोपियों संग रस लीला करने के कारण वे रसिया कहलाए। राधा और कृष्ण एक दूसरे से अत्यंत प्रेम करते थे। इसलिए इनका नाम समवेत रूप में आदरपूर्वक आज भी राधा-कृष्ण के नाम से लोग स्मरण करते हैं। मथुरा के आस पास के लोग आज भी जब आपस में मिलते हैं, तब एक दूसरे को राधे-राधे का कर भी संबोधित करते हैं।
इंद्र के कोप से गोकुल वासियों की रक्षा करने के लिए उन्होंने उंगली पर गोवर्धन पर्वत को धारण किया। इस तरह वे गिरधर के नाम से विख्यात हुए। कृष्ण ने कंस और चाणूर जैसे महाबलियों को वध किया। इसलिए कृष्ण को कंस-चाणूर मर्दक कहा जाता है।
कृष्ण का जन्म द्वापर युग में हुआ था। वह समय राजा-महाराजाओं का समय था। शक्ति प्रदर्शन, राज्य विस्तार आदि अनेक कारणों से राजा-महाराजाओं में परस्पर युद्ध होता था। युद्ध का परिणाम जय अथवा पराजय के रूप में होता था। कभी-कभी कुछ राजा ऐसे भी होते थे, जो रण छोड़कर भाग जाते थे। ऐसा ही कृष्ण के साथ भी एक बार हुआ था। इसलिए कृष्ण को रणछोड़ भी कहा जाता है। कृष्ण विष्णु के अवतार हैं। पीले वस्त्र धारण करते हैं। इसलिए इन्हें पीतांबर भी कहा जाता है। कृष्ण सुदर्शन चक्र धारण करते हैं। इसलिए इन्हें सुदर्शन चक्रधारी कहा जाता है।
डॉ. लूनेश कुमार वर्मा
रायपुर छत्तीसगढ़