आवरण

आवरण


कुछ लोग होते हैं ऐसे 

हरदम रहते हंसमुख।

कोई भला कैसे जाने

उसके दुःख और सुख।


अंतस की पीड़ा पीकर

खुश होने करते उपक्रम।

होते महान कलाकार वे

भीतर आग दिखता जल।


गंभीर से गंभीर स्थिति में 

रहते सदैव सहज-सरल।

कोई भला कैसे जाने 

पी रहा वह अंदर गरल।


सच है बनावटी संसार में 

कोई कहां होता अपना?

स्वार्थ साध चलते राह

आवरण से छुपता दुखड़ा।


दुखड़ा सुन पसीजता 

कहां किसी का हृदय?

सहानुभूति जता जाते

आप बीती स्वयं दर्शन।


संसार जाने जो भाषा 

बस वैसे ही रहना है।

भीतर रोना बाह्य आनंद 

अब तो यही दिखना है।


डॉ. लूनेश कुमार वर्मा 

रायपुर छत्तीसगढ़ 

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