फुलवारी
फुलवारी
आओ चलो थोड़ा समय निकालें,
दौड़ धूप व भागम भाग जीवन से।
चलें वहां जहां फूलों का बगीया हो
रंग बिरंगे खिले हुए हों फूल ढेर सारे।
खो जाएं हम भी उस रंगीन दुनिया में
पत्तियों बीच नीले पीले लाल गुलाबी।
खिलते खिलाते एक दूसरे से बतियाते
महकते निहारते संवारते हिलते डुलते।
अरे! देखो-देखो तितली रानी आयी
रसवन्ती फूलों को सार्थक करती सी।
शनै: शनै: मधु मकरंद उड़-उड़ लेती।
एक फूल से दूसरे तीसरे तक जाती।
मानो जाकर कुछ कहती कानों में
रस पी रस घोलती हंसी बागों में।
कुछ पल चलें छोड़ दुनियादारी को
ऐसी किसी सुंदर सी फुलवारी में।
डॉ. लूनेश कुमार वर्मा
रायपुर छत्तीसगढ़