सावन के गोठ

सावन के गोठ

चौमासा के दूसर महीना सावन आय। ए महीना म पानी-कांजी बनेच गिरथे। कई-कई दिन ले अगास म घम-घम ले करिया-करिया बादर घुमड़े रथे। कई घंव त सरलग कतको बेरा ले कभू रिमझिम-रिमझिम, त कभू रद-रद ले बरसा होथे। एकर ले गांव, गली, मोहल्ला, चारों मुड़ा तर-बतर हो जथे। नंदिया-नरवा म उफान आ जथे। पुल-पुलिया मन बूड़ जथे। आवा-जाही ठप्प हो जथे। जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जथे। 


हमर देस खेती-किसानी वाला आय। किसानी बर सावन के बड़ महत्व हे। किसानी बर पानी लागथे अउ सावन म छप्पर फाड़के पानी बरसथे। ए महीना म खेती-किसानी के काम-बुता ले गांव के लोगन मन ल फुरसत नई राहय। मनकापड़, खुमरी, छाता, बरसाती पहिरे लोगन मन अपन-अपन काम बुता म जाथे। रोपा-बियासी, निंदई म सब लगे रथे। इही  मउका म ददरिया गावत खेती-किसानी बड़ निक लागथे। 


सावन के आवत ले गांव मन म रोका-छेका हो जाय रथे। गांव के पशु मन ल चरइया चरवाहा मन घास भूइंया म लेग के चराथे। चरवाहा मन बांसुरी बजावत ओकर पाछू लगे रथे। हरियर-हरियर चारा चरत, मुड़ी हलावत गाय-भइंस के गला म बंधाय घंटी के अवाज सुने के अपन आनंद होथे। सावन म पानी कभू भी गिरे के संभावना रथे, तेकर सेती चरइया मन पानी ले बांचे बर खुमरी पहिरे रथे। खुमरी ह मुड़ी अतका ल पानी ले बचाथे। जाड, धाम अउ बरसा ले मुड़ी बचाय के उदिम करे ले परथे,  काबर कि मुड़ी हमर शरीर के अब्बड़ कन संवेदनशील अंग रथे।


सावन भोलेनाथ के प्रिय महीना आय। सावन के सम्मार ओकर बर बड़ सुग्घर कहे जाथे। लोगन मन सावन के सबो सम्मार के उपास-धास करथे। पढ़इया लइका मन घलो सावन सम्मारी के उपास रखे बर सधाय रथे। सावन म शिव मंदिर मन म लोगन के बड़ भीड़ रथे। अपन-अपन शक्ति अनुसार मनखे मन भोले बाबा के भक्ति करथे। कोनो पानी ले, त कोनो दूध, दही, भसम ले अभिषेक करथे। बेल पाना, धतूरा के फूल-फर, फुडहर के फूल-फर विशेष रूप ले शिवजी ल चघाए जाथे। सावन म भक्त मन भोले बाबा ल प्रसन्न करके मनोकामना पूरा करके बड़ उदिम करथे। कोनो पवित्र नदी के जल ल कांवर म धर के रेंगते-रेंगत भक्त मन शिव मंदिर म जाके पवित्र जल ले अभिषेक करथे।


हमर राज के राजधानी रायपुर म खारून नंदिया के तीर म महादेव के बड़ जुन्ना मंदिर हे। इही पायके नंदिया घाट के नांव महादेव घाट कहे जाथे। महादेव घाट म हट्टकेश्वर महादेव के मंदिर हे। वइसे साल भर भक्त अउ पर्यटक मन के आवाजाही लगे रथे। फेर सावन के महीना म इंहा भक्त मन के विशेष रूप ले अवइ होथे। महादेव के दर्शन अउ पूजा-पाठ करथे। दूरिहा-दूरिहा ले लोगन मन कांवर म जल ले के इंहा आथे अउ महादेव के जलाभिषेक करथे‌। पूरा सावन भर अइसने चलत रथे। सावन के सम्मार म कहूं हट्टकेश्वर नाथ के दर्शन करे ले जाबे, त मंदिर ले खारुन नदी तक घात लंबा लाइन रथे। पूजा-पाठ बर लाइन लगा के ओसरी-पारी दरशन करना चाही। सावन कतको झन घर म, मंदिर म, गांव-बस्ती म रुद्राभिषेक कराथे, शिव कथा कहिथे अउ सुनथे।


सावन म पानी के कमी नई राहय। खेत-खार, बारी-बखरी सब हरियर-हरियर दिखथे। चारो मुड़ा हरियर-हरियर देख के मन गदगद हो जथे। सावन के अमावस में इही पाय के हरेली तिहार मनाए जथे। हरेली के आवत ले खेती-किसानी के बहुत कन बुता-काम हो जाय रथे। तेकरे सेती हरेली म किसान मन अपन खेती-किसानी के साधन नांगर-बइला, रापा-रपली, गैंती, कुदारी, सबरी, हंसिया मन ल धो-धुवा के पूजा करथे। अपन किसानी के औजार मन ल धो के तुलसी चंउरा करा मुरुम के ऊपर रखथे अउ पूजा करथे। गंहू पिसान के गुड़ डार के गुरहा चीला ल चघाथे। घरो-घर चीला, फरा, बरा, सोंहारी चुरे के महक म पूरा गांव ममहाथे।


हरेली ल लोग-लइका मन अगोरत रथे, काबर के इही दिन गेड़ी चघे ल मिलथे। गेड़ी के पउवा म चघ के लइका मचथे। अइसने करे म रुच-रुच के अवाज आथे जेन ल सुन के सब के मन गदगद हो जथे। चूंकि सावन ह बरखा के महीना आय। पानी बरसे ले गली-गांव मन चिखला-चिखला हो जथे। अइसने म रेंगें म किचिर-काचर लागथे अउ गोड़ ह घलो चिखलिया जथे। एकरे ले बांचे के उपाय हमर सियान मन सोंचिन होंही अउ गेड़ी बनाए के उदिम करे होंही। फेर पाछू एला हमर तीज-त्योहार के परंपरा म जोड़ दिन होंही। तब ले हर साल हरेली के गेड़ी बनाए अउ चघे के परंपरा बनगे। अभी तक ले हर साल हरेली म गेड़ी बनाए जथे। ए मा चघे मजा चघइया मन तो जानथे देखइया मन ल घलो बड़ सुग्घर लागथे। अब तो गेड़ी नाच के घलो आयोजन होय ले धर ले हे। कतको जगा इही बेरा म हमर देसी खेल जइसे कबड्डी, खो-खो असन खेल मन के आयोजन करे जाथे। लोगन मन बड़ उछाह ले  खेल मा भाग लेथे। देखइया मन घलो ताली बजा-बजा उंकर हौसला बढ़ाथे।


असाढ के उमस अउ सावन के नमी के सेती वातावरण म परिवर्तन होथे। ए बेरा ह बैक्टीरिया अउ कीटाणु मन के पनपे बर बने अनुकूल होथे। सावन के बरखा म नदियां-नरवा के संग संग पीये के पानी म घलो बैक्टीरिया अउ कीटाणु मन समेलहा हो जथे। खाय-पीये के जिनिस मन म बैक्टीरिया अउ कीटाणु के घात लगे रथे। मक्खी-मच्छर मन घलो खाए-पीये के जिनिस मन ल प्रदूषित कर देथे। अइसने म रोग-राई बाढ़ जथे। लोगन मन सरदी-खांसी, उल्टी-टट्टी, बुखार असन बीमारी के शिकार हो जथे। एकर ले बांचे बर साफ-सफई के विशेष ध्यान रखना चाही। गांव-देहात म अइसने रोग-राई आय मन कतकोन झन बइगा-गुनिया करा जाथे। उंकर बिस्वास रथे कि कोनो टोनही-परेतिन के नजर लग गे हे। अरे भई, आज के जुग विज्ञान के जुग आय। कोनो मनखे टोनही-परेतिन नईं होवय। शरीर मन रोग-राई, टोनही-परेतिन के प्रकोप के सेती नो हरे, बैक्टीरिया अउ कीटाणु वाला खान-पान के सेती होथे। अइसने म बइगा-गुनिया करा जाय के बजाय डाक्टर करा जाना चाही।


हरेली घर दुवार म लीम डारा खोंचे के परंपरा हाबे। एकर पाछू मान्यता हाबे कि एकर ले घर म रोग-राई नई आय। सहर के लोगन मन के हरेली मनाए के ढंग म आजकाल परिवर्तन देखे जाथे। लोगन मन हरेली के दिन पर्यावरण ल सुग्घर बनाए बर नवा पौधा के रोपण करथे, अउ पेड़-पौधा के रक्षा संकल्प करथे। इइसे हरेली सहर म पर्यावरण जागरूकता के परब बन जाथे।


डॉ. लूनेश कुमार वर्मा 

रायपुर, छत्तीसगढ़ 

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