बनावटी व्यवहार समाज में ऐसे बहुत से लोग होते हैं, जो इसलिए नापसंद की जाते हैं, क्योंकि उनका व्यवहार बनावटी होता है। बनावटी व्यवहार का तात्पर्य सामने कुछ और व्यवहार करना और वास्तविक व्यवहार कुछ और होना होता है। ऐसे लोग जो सामने होने पर अच्छा व्यवहार करते हैं और पीठ पीछे बुराई करने लग जाते हैं। ऐसे ही लोगों के लिए कहा जाता है- मुंह में राम बगल में छुरी। जिनका भी इस तरह का दोगलापन व्यवहार होता है, उन पर कभी कोई विश्वास नहीं करता है। यदि हमें लोगों का विश्वास अर्जित करना है तो निश्चित रूप से सद्व्यवहार करना होगा। अपने कहे हुए पर अडिग रहना होगा। जो व्यक्ति अपने कहे हुए पर अधिक रहता है, वह सहज ही लोगों का विश्वास अर्जित कर लेता है। लोग किसी की इज्जत इसलिए नहीं करते हैं कि वह बड़ा व्यक्ति है। इज्जत इसलिए किया जाता है क्योंकि वह व्यक्ति सच्चरित्र होता है। ऐसे ही चरित्रवान व्यक्ति की यदि समाज में खोज की जाए तो शिक्षक वर्ग इसमें प्रायश: खरा उतरता है। शिक्षण केवल व्यवसाय मात्र नहीं है अपितु चरित्र निर्माण का महत्वपूर्ण उद्यम है। शिक्षक सदैव चरित्रवान रहकर अपने चरित्र ...
श्री कृष्ण के रूप कृष्ण का जन्म विपरीत परिस्थितियों में कंस की काल कोठरी में हुआ। जन्म होते ही उन्हें अपने वास्तविक माता-पिता से दूर होना पड़ा। नंदग्राम में नंद बाबा और यशोदा मैया के संरक्षण में इनका लालन-पालन हुआ। यहां भी संकटों ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। कृष्ण बचपन से ही लीला करने वाले रहे हैं। पूतना से लेकर चाणूर तक सबका उन्होंने लीला करते हुए संहार किया। कृष्ण के वास्तविक के पिता वसुदेव और माता देवकी हैं। वासुदेव के पुत्र होने के कारण कृष्ण को वासुदेव और माता देवकी के पुत्र होने के कारण उन्हें देवकीनंदन कहा जाता है। कृष्ण का लालन-पालन चूंकि नंद बाबा और यशोदा मैया ने किया था। इसलिए कृष्ण को नंदलाल और यशोदा नंदन के नाम से भी जाना जाता है। वासुदेव का रंग काला था। इसलिए इन्हें कृष्ण, श्याम कहा जाता है। तद्भव रूप मे कृष्ण को केशव, कन्हैया, किसन भी कहा जाता है। कृष्ण को बचपन से ही मक्खन बहुत प्रिय था। वे अपने बाल सखाओं के साथ दूसरों के घरों से माखन चोरी कर खा लिया करते थे। इसलिए उन्हें माखन चोर के नाम से भी संबोधित किया जाता है। कृष्ण के नटखट स्वभाव के कारण इन्हें नटखट भी ...
आवरण कुछ लोग होते हैं ऐसे हरदम रहते हंसमुख। कोई भला कैसे जाने उसके दुःख और सुख। अंतस की पीड़ा पीकर खुश होने करते उपक्रम। होते महान कलाकार वे भीतर आग दिखता जल। गंभीर से गंभीर स्थिति में रहते सदैव सहज-सरल। कोई भला कैसे जाने पी रहा वह अंदर गरल। सच है बनावटी संसार में कोई कहां होता अपना? स्वार्थ साध चलते राह आवरण से छुपता दुखड़ा। दुखड़ा सुन पसीजता कहां किसी का हृदय? सहानुभूति जता जाते आप बीती स्वयं दर्शन। संसार जाने जो भाषा बस वैसे ही रहना है। भीतर रोना बाह्य आनंद अब तो यही दिखना है। डॉ. लूनेश कुमार वर्मा रायपुर छत्तीसगढ़