नशा
नशा
जब आयी है उसके पास दौलत
फांस लिया है उसने एक औरत
उलझा रहता है वह उसके केशो में
समा गई वह औरत उसके नसों में
खोया रहता है दिन रात उसके यादों में
चैन नहीं आता है और किन्हीं बातों में
काम काज त्याग कर रहता है लिप्त
आए दिन देता है नया-नया उसे गिफ्ट
लोक-लाज का नहीं उसे अब भय
चाटुकारों से मिल जाता नित शह
दौलत से बड़ा हो गया माया का नशा
बेड़ियों से मजबूत जाल में वह फंसा
जाने कैसे आएगी अब उसे अक्ल
देखते-देखते बिगड़ गई उसकी शक्ल
समय रहते होगा उसे शीघ्र ही संभलना
दूभर हो जाएगा अन्यथा पैरों से चलना।
डॉ लूनेश कुमार वर्मा
रायपुर छत्तीसगढ़