धागा बांधा प्रीत का

धागा बांधा प्रीत का 

चाहा था मन ही मन

संयोग हुआ संबंध हुआ 

समय ने धागा बांधा प्रीत का

हुए एक दूसरे के सदा के लिए 

समय व्यतीत होता रहा 

खट्टे-मीठे अनुभवों से होते

जीवन यात्रा चलती रही 

बच्चे हुए बड़े हुए 

पढ़ें-लिखे खूब मेहनत से 

रोजगार की खोज में 

हुए सब हमसे दूर 

अब अवसान बेला में 

एक दूसरे का ही साथ है

बंधा है धागा अब भी प्रेम

कोई नहीं है पास

बस निभा रहे हैं साथ।


डॉ लूनेश कुमार वर्मा 

रायपुर छत्तीसगढ़ 

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