मैं चित्रकार हूं
मैं चित्रकार हूं
चित्र बनाना मेरा कर्म-धर्म भी
यूं तो नित बनाता हूं चित्र
तरह-तरह के विभिन्न भावाधारित
जब जिस तरह होता है मन
उकेरता हूं विविध रंगों में भावों को
लिए हाथों में तुलिका और रंग
कभी अनायास उभर आता है
कोई अनोखा अनजाना रूप
यूं तो होती सब किशोरों के मन में
एक नवयुवती से एकाकार का स्वप्न
आज जब बनाने हुआ उद्यत
दिल के भाव आया उभर पटल पर
बसी थी मेरे भी हृदय पटल पर
एक लहराते बालों वाली किशोरी
गुलाबी थे उसके गाल
चमक रहा था उसका भाल
मधुर मुस्कान उसके अधरों पर
नयन विशाल सस्मित वदन
चल रही थी तुलिका विविध रंगों से
शनै: शनै: उभर रही थी वह
हृदय के भाव ले रहा आकार
हो रहा था संपूर्ण वातावरण
सुंदर गुलाबों से सुगंधित
रंग भर रहा था मैं दत्तचित्त
उपस्थित हो रही वह मधुर मुस्कान
यही है मेरे चित्रकर्म का उपहार।
डॉ. लूनेश कुमार वर्मा
रायपुर छत्तीसगढ़