अंतर्मन की पीर
अंतर्मन की पीर
अपने अंतर्मन की पीर किससे कहूं
बस अपनी पीड़ा आप ही जानूं
न कोई जाने न कोई समझे
अपने तो अपने ही अंग भी
कहना नहीं मानते
मन तो चलता है
शरीर साथ नहीं देता है
चाहता हूं हाथ चले पांव चले
किन्तु चाहने भर तो काम नहीं बनता
शरीर में वह शक्ति वह ऊर्जा वह ताकत
अब कहां, जो मन की बात मानें
हाथ कांपते हैं, पांव डगमगाते हैं
दिमाग की शक्ति दिन-दिन
क्षीण हो रही है
कुछ याद नहीं रहता
क्या खाया कितना खाया
खाया भी या नहीं?
मन चाहता है बात करुं ढेर सारी
पर किससे?
कोई अब पास आता नहीं
ऐसा नहीं कि आज की पीढ़ी के
पास आते नहीं
आते हैं पैर छू चले जाते हैं
मुझ पर या मेरी बातों पर
अब किसी का विश्वास जमता नहीं
एक समय था जब
मुझे सुनने लालायित रहते थे लोग
अब तो अपने भी…
अंतर्मन पीर किससे कहूं?
डॉ लूनेश कुमार वर्मा
रायपुर छत्तीसगढ़